शनिवार, 6 जनवरी 2018

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शिरडी आने पर श्री साईं बाबा मस्जिद में निवास करने लगे बाबा के शिरडी में आने के पूर्व देवीदास नाम के एक सन्त अनेक वर्षों से वहाँ रहते थे। बाबा को वे बहुत प्रिय थे। वे उनके साथ कभी हनुमान मंदिर में और कभी चावड़ी में रहते थे। कुछ समय के पश्चात जानकीदास नाम के एक सन्त का भी शिरडी में आगमन हुआ।

अब बाबा जानकीदास से वार्तालाप करने में अपने बहुत-सा समय व्यतीत करने लगे। जानकीदास भी कभी बाबा के स्थान आया करते थे और पुणाताम्बे की श्री गंगागीर नामक एक पारिवारिक वैश्य संत भी बहुधा बाबा के पास आया - जाया करते थे। जब प्रथम उन्होंने श्री साईं बाबा को बगीचा सिंचन केलिए पानी धोते देखा तो उन्हें बड़ा अचम्भा हुआ। वे स्पष्ट शब्दों में कहने लगे कि - " शिरडी परम भाग्यशालीनी है , जहाँ एक अमूल्य हीरा है। जिन्हें तुम इस प्रकार परिश्रम करते हुए देख रहे हो, वे कोई सामान्य पुरुष नहीं है।

अपितु यह भूमि बहुत भाग्यशालीनी तथा महान पुण्य भूमि है , ईसिस कारण से यह रत्न प्राप्त हुआ है।" इसी प्रकार श्री अक्कलकोट महाराज के एक प्रसिद्द शिष्य संत आनन्द नाथ (येवलामठ) जो कोई शिरडी निवासियों के साथ शिरडी पधारे , उन्होंने भी स्पष्ट कहा है कि "यद्यपि बाह्रादृष्टि से ये साधारण व्यक्ति जैसे प्रतीत होते हैं , परन्तु ये सचमुच असाधारण व्यक्ति है। इसका तुम लोग को भविष्य में अनुभव होगा।" ऐसा कहकर ये येवला को लौट गए। यह उस समय की बात है , जब शिरडी बहुत ही साधारण-सा गाँव था और साईं बाबा बहुत छोटी उम्र के थे।



माँ झूठ बोलती है..

माँ झूठ बोलती है.....

सुबह जल्दी उठाने सात बजे को आठ कहती
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है,
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती
छोटी परेशानियों का बड़ा बवंडर करती है




 ...
.......माँ बड़ा झूठ बोलती है




थाल भर खिलाकर तेरी भूख मर गयी कहती है
जो मैं न रहू घर पे तो मेरे पसंद की
कोई चीज़ रसोई में उनसे नही पकती है,
मेरे मोटापे को भी कमजोरी की सूज़न बोलती है
..........माँ बड़ा झूठ बोलती है

माँ झूठ बोलती है.....

सुबह जल्दी उठाने सात बजे को आठ कहती
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है,
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती
छोटी परेशानियों का बड़ा बवंडर करती है

....माँ बड़ा झूठ बोलती है

थाल भर खिलाकर तेरी भूख मर गयी कहती है
जो मैं न रहू घर पे तो मेरे पसंद की
कोई चीज़ रसोई में उनसे नही पकती है,
मेरे मोटापे को भी कमजोरी की सूज़न बोलती है

..........माँ बड़ा झूठ बोलती है

दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए बोल कर
एक मेरे नाम दस लोगो का खाना भरती है,
कुछ नही-कुछ नही, बोल नजर बचा बैग में
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है

.......माँ बड़ा झूठ बोलती है

टोका टाकी से जो मैं झुंझला जाऊ कभी तो,
समझदार हो अब न कुछ बोलूंगी मैं,
ऐसा अक्सर बोलकर वो रूठती है
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती होती है

........माँ बड़ा झूठ बोलती है

तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाउंगी,
सारी फिल्मे तो टी वी पे आ जाती है,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है
बहानो से अपने पर होने वाले खर्च टालती है

 ........माँ बड़ा झूठ बोलती है

मेरी उपलब्द्धियो को बढ़ा चढ़ा कर बताती
सारी खामियों को सब से छिपा लेती है
उनके व्रत ,नारियल,धागे ,फेरे मेरे नाम
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है

........ माँ बड़ा झूठ बोलती है

भूल भी जाऊ दुनिया भर के कामो में उलझ
उनकी दुनिया मैं वो मुझे कब भूलती है, ?
मुझ सा सुंदर उन्हें दुनिया में ना कोई दिखे
मेरी चिंता में अपने सुख भी नही भोगती है

.........माँ बड़ा झूठ बोलती है

मन सागर मेरा हो जाए खाली ऐसी वो गागर
जब पूछो अपनी तबियत हरी बोलती है,
उनके ‘जाये” है, हम भी रग रग जानते है
दुनियादारी में नासमझ वो भला कहाँ समझती है

........माँ बड़ा झूठ बोलती है

उनकी फैलाए सामानों से जो एक उठा लू
खुश होती जैसे उन पे उपकार समझती है,
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे गहरी उदासी
सोच सोच अपनी तबियत का नुक्सान सहती है

........माँ बड़ा झूठ बोलती है ।।

दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए बोल कर
एक मेरे नाम दस लोगो का खाना भरती है,
कुछ नही-कुछ नही, बोल नजर बचा बैग में
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है

.......माँ बड़ा झूठ बोलती है
टोका टाकी से जो मैं झुंझला जाऊ कभी तो,
समझदार हो अब न कुछ बोलूंगी मैं,
ऐसा अक्सर बोलकर वो रूठती है
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती होती है



........माँ बड़ा झूठ बोलती है 


तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाउंगी,
सारी फिल्मे तो टी वी पे आ जाती है,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है
बहानो से अपने पर होने वाले खर्च टालती है

 ........माँ बड़ा झूठ बोलती है

मेरी उपलब्द्धियो को बढ़ा चढ़ा कर बताती
सारी खामियों को सब से छिपा लेती है
उनके व्रत ,नारियल,धागे ,फेरे मेरे नाम
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है

........ माँ बड़ा झूठ बोलती है

भूल भी जाऊ दुनिया भर के कामो में उलझ
उनकी दुनिया मैं वो मुझे कब भूलती है, ?
मुझ सा सुंदर उन्हें दुनिया में ना कोई दिखे
मेरी चिंता में अपने सुख भी नही भोगती है

.........माँ बड़ा झूठ बोलती है



मन सागर मेरा हो जाए खाली ऐसी वो गागर
जब पूछो अपनी तबियत हरी बोलती है,
उनके ‘जाये” है, हम भी रग रग जानते है
दुनियादारी में नासमझ वो भला कहाँ समझती है

........माँ बड़ा झूठ बोलती है

उनकी फैलाए सामानों से जो एक उठा लू
खुश होती जैसे उन पे उपकार समझती है,
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे गहरी उदासी
सोच सोच अपनी तबियत का नुक्सान सहती है

........माँ बड़ा झूठ बोलती है ।।

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

फ़क़ीर को "साईं" नाम कैसे प्राप्त हुआ?







फ़क़ीर को "साईं" नाम कैसे प्राप्त हुआ?

जब बारात शिरडी में पहुँची तो खंडोबा के मंदिर के समीप म्हालसापति के खेत में, तब बारात को एक वृक्ष के नीचे ठहराई गई। खंडोबा जी के मंदिर के सामने ही सब बैलगाड़ियाँ खोल दीं गई और बरात के सभी बाराती गण एक-एक करके सब लोग एक-एक करके नीचे उतरने लगे। 
उस रूपवान  और सूर्य के प्रकाश के जैसे तेजस्वी  चेहरे वाले तरुण फ़क़ीर को उतरते देखकर , म्हालसापति ने "आओ साईं " आओ साईं आओ साईं(मराठी में " या साईं !') कहकर उनका अभिनन्दन किया तथा अन्य उपस्थित लोगों ने भी साईं नाम के जयकारे के साथ उस रूपवान तरुण फकीर को साईं नाम   ' शब्द से ही सम्बोधन कर उनका आदर किया। इसके पश्चात वे 'साईं ' नाम से ही प्रसिद्द हो गए।

तबसे
साईं बाबा का साईं नाम बहुत ही पतित और पावन है,  जो भी भक्त श्रद्धा से बाबा को पुकारता है  साईं दौड़े दौड़े चले आते हैं.  आप भी सुबह शाम हर पल साईं नाम का स्मरण जरूर करें,
बाबा आपकी हर मनोकामना पूर्ण करेंगे.  यह हमारा अटूट विश्वास है इन्हीं आशाओं के साथ आप सभी को ओम साईं राम बाबा की कृपा आप सभी पर बनी रहे.

        राम गुप्ता (लवलेश)
सह सचिव श्री साई बाबा सेवा आश्रम
करगी रोड कोटा जिला बिलासपुर छत्तीसगढ़
 स्थापित 1972 रजि नं 11025
सम्पर्क सूत्र-8602160984
                 9893744778

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने बाबा की लीलाओं को पूरा पढा।
साई बाबा आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें


गाय का झूठा गुड़

       गाय का झूठा गुड़

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था।

एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल
होने से बचना..
लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।



उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था, हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था , पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी  आकर रूकी,

और उसमें से एक वृद्ध उतरे,अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।



वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये, पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था, अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया, सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने मां बाप को घेर लेते हैं, कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी, वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।


कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता,

हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था
वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे,मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।



मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूठा गुड क्यों खाया ??

उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।

जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।

मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???

   वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।

 मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश  में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।

कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया।

           और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,

मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,

शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ,

मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,

मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई , मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला
बापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।

सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।

 उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि.....,

गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है,
जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं।

 इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।

ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।

*।। जय गौ माता।।*

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

(((((((((( सच्चा सन्यास ))))))))))

(((((((((( सच्चा सन्यास ))))))))))
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एक व्यक्ति प्यास से बेचैन भटक रहा था. उसे गंगाजी दिखाई पड़ी. पानी पीने के लिए नदी की ओर तेजी से भागा लेकिन नदी तट पर पहुंचने से पहले ही बेहोश होकर गिर गया।

थोड़ी देर बाद वहां एक संन्यासी पहुंचे. उन्होंने उसके मुंह पर पानी का छींटा मारा तो वह होश में आया. व्यक्ति ने उनके चरण छू लिए और अपने प्राण बचाने के लिए धन्यवाद करने लगा।



संन्यासी ने कहा- बचाने वाला तो भगवान है. मुझमें इतना सामर्थ्य कहां है ? शक्ति होती तो मेरे सामने बहुत से लोग मरे मैं उन्हें बचा न लेता. मैं तो सिर्फ बचाने का माध्यम बन गया।

इसके बाद संन्यासी चलने को हुए तो व्यक्ति ने कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगा. संन्यासी ने पूछा- तुम कहां तक चलोगे. व्यक्ति बोला- जहां तक आप जाएंगे।

संन्यासी ने कहा मुझे तो खुद पता ही नहीं कि कहां जा रहा हूं और अगला ठिकाना कहां होगा. संन्यासी ने समझाया कि उसकी कोई मंजिल नहीं है लेकिन वह अड़ा रहा. दोनों चल पड़े।

कुछ समय बाद व्यक्ति ने कहा- मन तो कहता है कि आपके साथ ही चलता रहूं लेकिन कुछ टंटा गले में अटका है. वह जान नहीं छोड़ता. आपकी ही तरह भक्तिभाव और तप की इच्छा है पर विवश हूं।

संन्यासी के पूछने पर उसने अपने गले का टंटा बताना शुरू किया. घर में कोई स्त्री और बच्चा नहीं है. एक पैतृक मकान है उसमें पानी का कूप लगा है।

छोटा बागीचा भी है. घर से जाता हूं तो वह सूखने लगता है. पौधों का जीवन कैसे नष्ट करूं. नहीं रहने पर लोग कूप को गंदा करते हैं. नौकर रखवाली नहीं करते, बैल भूखे रहते हैं. बेजुबान जानवर है उसे कष्ट दूं।

बहुत से संगी-साथी हैं जो मेरे नहीं होने से उदास होते हैं, उनके चेहरे की उदासी देखकर उनका मोह भी नहीं छोड़ पाता।

दादा-परदादा ने कुछ लेन-देन कर रखा था. उसकी वसूली भी देखनी है. नहीं तो लोग गबन कर जाएंगे. अपने नगर से भी प्रेम है।

बाहर जाता हूं तो मन उधर खिंचा रहता है. अपने नगर में समय आनंदमय बीत जाता है. लेकिन मैं आपकी तरह संन्यासी बनना चाहता हूं. राह दिखाएं।

संन्यासी ने उसकी बात सुनी फिर मुस्कराने. लगे. उन्होंने कहा- जो तुम कर रहे हो वह जरूरी है. तुम संन्यास की बात मत सोचो. अपना काम करते रहो।

व्यक्ति उनकी बात समझ तो रहा था लेकिन उस पर संन्यासी बनने की धुन भी सवार थी।

चलते-चलते उसका नगर आ गया. उसे घर को देखने की इच्छा हुई. उसने संन्यासी से बड़ी विनती की- महाराज मेरे घर चलें. कम से कम 15 दिन हम घर पर रूकते हैं. सब निपटाकर फिर मैं आपके साथ निकल जाउंगा।

संन्यासी मुस्कुराने लगे और खुशी-खुशी तैयार हो गए. उसकी जिद पर संन्यासी रूक गए और उसे बारीकी से देखने लगे।

सोलहवें दिन अपना सामान समेटा और निकलने के लिए तैयार हो गए. व्यक्ति ने कहा-महाराज अभी थोड़ा काम रहता है. पेड़-पौधों का इंतजाम कर दूं. बस कुछ दिन और रूक जाएं निपटाकर चलता हूं।

संन्यासी ने कहा- तुम हृदय से अच्छे हो लेकिन किसी भी वस्तु से मोह त्यागने को तैयार ही न हो. मेरे साथ चलने से तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता. किसी भी संन्यासी के साथ तुम्हारा भला नहीं हो सकता।

उसने कहा- कोई है ही नहीं तो फिर किसके लिए लोभ-मोह करूं।

संन्यासी बोले- यही तो और चिंता की बात है. समाज को परिवार समझ लो, उसकी सेवा को भक्ति. ईश्वर को प्रतिदिन सब कुछ अर्पित कर देना. तुम्हारा कल्याण हो इसी में हो जाएगा. कुछ और करने की जरूरत नहीं।
वह व्यक्ति उनको कुछ दूर तक छोड़ने आया. विदा होते-होते उसने कहा कि कोई एक उपदेश तो दे दीजिए जो मेरा जीवन बदल दे।

संन्यासी हंसे और बोले- सत्य का साथ देना, धन का मोह न करना. उन्होंने विदा ली।

कुछ साल बाद वह संन्यासी फिर वहां आए. उस व्यक्ति की काफी प्रसिद्धि हो चुकी थी. सभी उसे पक्का और सच्चा मानते थे. लोग उससे परामर्श लेते. छोटे-मोटे विवाद में वह फैसला देता तो सब मानते.उसका चेहरा बताता था कि संतुष्ट और प्रसन्न है।

संन्यासी कई दिन तक वहां ठहरे. फिर एक दिन अचानक तैयार हो गए चलने को।

उस व्यक्ति ने कहा- आप इतनी जल्दी क्यों जाने लगे. आपने तो पूछा भी नहीं कि मैं आपके उपदेश के अनुसार आचरण कर रहा हूं कि नहीं।




संन्यासी ने कहा- मैंने तुम्हें कोई उपदेश दिया ही कहां था ? पिछली बार मैंने देखा कि तुम्हारे अंदर निर्जीवों तक के लिए दया है लेकिन धन का मोह बाधा कर रहा था. वह मोह तुम्हें असत्य की ओर ले जाता था हालांकि तुम्हें ग्लानि भी होती थी।

तुम्हारा हृदय तो सन्यास के लिए ऊर्वर था. बीज पहले से ही पड़े थे, मैंने तो बस बीजों में लग रही घुन के बारे में बता दिया. तुमने घुन हटा दी और फिर चमत्कार हो गया. संन्यास संसार को छोड़कर ही नहीं प्राप्त होता. अवगुणों का त्याग भी संन्यास है।

हम सब में उस व्यक्ति की तरह सदगुण हैं. जरूरत है उन्हें निखारने की. निखारने वाले की. अपने काम करने के तरीके में थोड़ा बदलाव करके आप चमत्कार कर सकते हैं।

एक बदलाव आजमाइए- हर किसी से प्रेम से बोलें. उनसे ज्यादा मीठा बोलेंगे जिन पर आपका शासन है. आपमें जो मधुरता आ जाएगी वह जीवन बदल देगी कम से कम इसे आजमाकर देखिए।
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राम गुप्ता [लवलेश ]



बुधवार, 3 जनवरी 2018

संन्सकार का सही अर्थ क्या है

संन्सकार का सही अर्थ क्या है आइए एक कथानक के द्वारा समझनें का प्रयास करते है !
                    


 एक राजा के पास सुन्दर घोडीथी । कई बार युद्व में इस घोडी ने राजा के प्राण बचाये और घोडी राजा के लिए पूरी वफादार थी कुछ दिनों के बाद इस घोडी ने एक बच्चे को जन्म दिया, बच्चा काना पैदा हुआ पर शरीर हष्ट पुष्ट व सुडौल था ।

बच्चा बडा हुआ बच्चे ने मां से पूछा मां मैं बहुत बलवान हूँ पर काना हूँ यह कैसे हो गया इस पर घोडी बोली बेटा जब में गर्भवती थी तू पेट में था तब राजा ने मेरे उपर सवारी करते समय मुझे एक कोडा मार दिया जिसके कारण तू काना हो गया ।

 यह बात सुनकर बच्चे को राजा पर गुस्सा आया और मां से बोला मां मैं इसका बदला लूंगा ।

मां ने कहा राजा ने हमारा पालन - पोषण किया है तू जो स्वस्थ है सुन्दर है उसी के पोषण से तो है , यदि राजा को एक बार गुस्सा आ गया तो इसका अर्थ यह नहीं है की हम उसे क्षति पहुचाये पर उस बच्चे के समझ में कुछ नहीं आया उसने मन ही मन राजा से बदला लेने की सोच ली ।



एक दिन यह मौका घोडे को मिल गया राजा उसे युद्व पर ले गया । युद्व लडते - लडते राजा एक जगह घायल हो गया घोडा उसे तुरन्त उठाकर वापिस महल ले आया ।

 इस पर घोडे को ताज्जूब हुआ और मां से पूछा मां आज राजा से बदला लेने का अच्छा मौका था पर युद्व के मैदान में बदला लेने का ख्याल ही नहीं आया और न ही ले पाया , मन ने गवाही नहीं दी इस पर घोडी हंस कर बोली बेटा तेरे खून में, तेरे संस्कार में धोखा है ही नहीं, तू जानकर धोखा दे ही नहीं सकता है ।

तुझसे नमक हरामी हो नहीं सकती क्योकि तेरी नस्ल में तेरी मां का ही तो अंश है ।
बाकई यह सत्य है जैसे हमारे संस्कार होते है बैसा ही हमारे मन का व्यवहार होता है हमारे पारिवारिक संस्कार अवचेतन मस्तिष्क में गहरे वैठ जाते है माता पिता जिस संस्कार के होते है उनके बच्चे भी उसी संस्कारों को लेकर पैदा होते है ।हमारे कर्म ही संस्‍कार बनते है और संस्कार ही प्रारब्धो का रूप लेते है ! यदि हम कर्मो को सही व वेहतर दिशा दे दे तो संस्कार अच्छे बनेगें और संस्कार अच्छे बनेंगे तो जो प्रारब्ध का फल बनेगा वह मीठा व स्वादिष्ट होगा ।

हमें प्रतिदिन कोशिश करनी होगी की हमसे जानकर कोई धोखा न हो, गलत काम न हो, चिटिंग न हो । बस स्थिति अपने आप ठीक होती जायेगी ।

सोमवार, 1 जनवरी 2018

Rhapsody Of Realities

*Rhapsody Of Realities*
_Look Ahead_

Pastor Chris

```…but this one thing I do, forgetting those things which are behind, and reaching forth unto those things which are before (Philippians 3:13).```

There’s so much the Lord has in store for you to enjoy in the coming year. Look forward to the New Year with faith and joy, for greater glory lies ahead, and it completely outshines the victories and triumphs of yesterday. Refuse to allow the seeming failures, weaknesses, and disappointments you may have experienced dissipate your enthusiasm and faith to win.


Set your goals and focus on the Spirit and His Word. Don’t focus on the past. Look ahead. Raise your vision. The regrets of yesterday and the fear of tomorrow are enemies of today’s happiness. Position yourself aright for a triumphant life by keeping your gaze on, and living in the Word. Refuse to give up on your dreams.

Proverbs 4:18 says, “…the path of the just is as the shining light, that shineth more and more unto the perfect day.” Believe and affirm this as the reality of your life. You can only make progress as a child of God. Your journey in life is upward and forward only; no disappointments, because “…we know that all things work together for good to them that love God, to them who are the called according to his purpose” (Romans 8:28).


Cheer up! The future is bright. You have nothing to fear. The Lord has already made the crooked paths straight; therefore, you’ll triumph in the coming year. He said in John 16:33, “These things I have spoken unto you, that in me ye might have peace. In the world ye shall have tribulation: but be of good cheer; I have overcome the world.”

See yourself making greater impact with the Gospel in the coming year. See yourself in health, joy, and prosperity. See yourself walking in righteousness and producing works and fruits of righteousness. See yourself fulfilling the will of the Father, pleasing Him in all things as you receive and run with the Word for the year.

Make certain to participate live in our December 31 st New Year’s Eve Service in your Church, online at http://pastorchrisonline.org or via major satellite and terrestrial TV stations, and designated viewing centres around the world.

             
*CONFESSION*
_I’m strong and very courageous, standing firm in faith, reaching out and apprehending the glories that lie ahead. My path is like the first gleam of dawn, which shines ever brighter until the full light of day. I’m walking in righteousness and producing works and fruits of righteousness. Blessed be God!_

*FURTHER STUDY:*

*|| Isaiah 43:18-20 MSG "Forget about what's happened; don't keep going over old history. 19 Be alert, be present. I'm about to do something brand-new. It's bursting out! Don't you see it? There it is! I'm making a road through the desert, rivers in the badlands. 20 Wild animals will say 'Thank you!'--the coyotes and the buzzards--Because I provided water in the desert, rivers through the sun-baked earth, Drinking water for the people I chose, ||*


*DAILY SCRIPTURE READING*

1-Year Bible Reading Plan: Revelation 22,
Malachi 3-4

2-Year Bible Reading Plan: Acts 5:24-32,
Nehemiah 1-2

पूजा करते समय यह चीज गिर जाए तो समझो साक्षात साईं भगवान खड़े हैं पास विशेष संकेत

 जय साईं राम स्वागत है आप सभी का आपके अपने चैनल पर तो जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हम सभी बाबा को प्रतिमा पर मूर्ति पर माला चढ़ाते हैं घर की ...